लब आज़ाद हैं।

पैरों की बेड़ियाँ ख्वाबों को बांधे नहीं रे, कभी नहीं रे
मिट्टी की परतों को नन्हे से अंकुर भी चीरे, धीरे-धीरे
इरादे हरे-भरे, जिनके सीनों में घर करे
वो दिल की सुने, करे, ना डरे, ना डरे

सुबह की किरनों को रोकें, जो सलाखें है कहाँ
जो खयालों पे पहरे डाले वो आँखें है कहाँ
पर खुलने की देरी है परिंदे उड़ के चूमेंगे
आसमां आसमां आसमां

आज़ादियाँ, आज़ादियाँ
मांगे न कभी, मिले, मिले, मिले
आज़ादियाँ, आज़ादियाँ
जो छीने वही, जी ले, जी ले, जी ले
सुबह की किरनों...

कहानी ख़तम है
या शुरुआत होने को है
सुबह नयी है ये
या फिर रात होने को है
आने वाला वक़्त देगा पनाहें
या फिर से मिलेंगे दो राहें
खबर क्या, क्या पता

उड़ान फिल्म का गाना जो मुझे प्रेरित करता है आगे बढ़ने के लिए,सपनों को जीने के लिए,लिखने के लिए।

लब आज़ाद हैं।🙌

Comments

  1. शानदार शुरुआत , आशा करते है आगे बहुत कुछ पढ़ने को और सीखने को मिलेगा....
    अगले ब्लॉग का इंतज़ार रहेगा
    लब आज़ाद हैं 🙌

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    1. धन्यवाद भाई।
      पढ़ने को जरूर मिलेगा।
      सीखने का पता नहीं।😂

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